अंतिम कविता

– अशान्त ·

– Ashant ·

· in

तुम्हारी निर्ममता से क्षत-विक्षत
रो-रो कर सूख गया
मेरा क्लान्त हृदय
नींव है असफलता और दुःख की
तुम्हारे सामीप्य को किये गये
मेरे समस्त प्रयास
काश! तुमने मुझसे झूठ न बोला होता।
भौतिकता की वेदी पर
मेरे सरल भाव मार दिये तुमने
काश! तुम्हें सामने कुछ कह पाता मैं
काश! तुमसे घृणा कर पाता मैं
तुम्हारे प्रति मेरा प्रेम
कर देता है पराजित
मेरी हर क्षणिक ऋणात्मक भावना को;
तुम विजयी हुयी अपनी खोज में
तुम्हें मिल गया तुम्हारा प्रेम
मेरे अंदर मत खोजो देवत्व की संभावना 
मैंने प्रेम के साथ उसका अंतरण किया है तुम पर;
मैं तुम्हें बधाई देता हूँ, आज से
मैं अपनी निजी अभिव्यक्ति मौन करता हूँ
मैं अपना प्रेम स्वयं में विसर्जित करता हूँ
यह मेरी आत्महत्या है
यह मेरी “अंतिम कविता” है।
– अशान्त

– अशान्त

– Ashant

अशान्त की चिट्ठी

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