अब तक अलसाया हुआ इलाहाबाद जैसे प्रयागराज बनते ही किसी नयी ऊर्जा से भर गया है। किसी चपल बालक की भाँति एक कदम में चार कदमों की छलाँग लगाते हुआ यह नगर आध्यात्म के महापर्व कुम्भ मेले के लिये तैयार है। अभूतपूर्व व्यवस्था के साथ इस बार का कुम्भ एक वृहद बदलाव का भी साक्षी बन रहा है। पूरा नगर ऐसे सजा है जैसे राम के वनवास से लौटने पर अयोध्या सजी रही होगी। हर श्रद्धालु में व्याप्त राम उस परम तत्व से एकाकार होने की यात्रा पर आ रहा है।
भारतीय सभ्यता में कलश समृध्दि का प्रतीक है। समृद्धि का धार्मिक अर्थ परस्पर उन्नति का होता है। प्रयागराज का हर चौराहा इस नगर की आकस्मिक विकास यात्रा का प्रतीक है। ऐसा लगता है कि ब्रह्मा द्वारा निष्पादित प्रथम यज्ञ से लेकर असंख्य आत्माओं की मुमुक्षा एवं तपस्या का प्रतीक यह नगर आज वर्षों बाद अपनी मौलिक अभिव्यक्ति कर रहा है, जिसमें सुंदरता एवं प्रखरता दोनों ही है।
नदियों के संगम हेतु प्रसिद्ध यह नगर आज प्राचीन और अर्वाचीन के अद्भुत संगम का साक्षी है। सूर्य जब उत्तरायण होकर भारतवर्ष को ऊष्मा देने को तत्पर है उसी क्षण यह हर प्रयागवासी और भारती के लिये नवीनता को आत्मसात करने की संभावना प्रदर्शित कर रहा है।
कहते हैं तीर्थ यात्रा के दौरान किसी भी प्रकार के सामाजिक अनुक्रम का लोप हो जाता है। माँ गंगा की उदात्त लहरें जब गाम्भीर्य से परिपूर्ण यमुना से मिलती हैं, जिसमें ज्ञानस्वरूपा अदृश्य सरस्वती सदैव विद्यमान रहती हैं तो यह मात्र भौगोलिक घटना नहीं रह जाती है। अपितु, यह प्रकृति का मानव जाति हेतु समरसता का संदेश है जो कि मूर्त रूप में हमें कुम्भ मेले में दिखाई देता है। हमारी समस्त विभिन्नता का लोप होना ही हमारी वास्तविक सार्थकता है, मनुष्यत्व की अदम्य यात्रा है।
कुम्भ प्रतीक है अमरत्व का। देवासुर संग्राम के पश्चात सागर मंथन से निकले कुम्भ कलश सेअमृत की बूँद जो किसी काल में इस नगर में गिरी थी वो आज भी इस नगर पर अपना असर रखती है। संस्कृति से लेकर व्यक्तिगत भावों तक इस नगर में कुछ नहीं मरता। चालीस दिवसों में एक कल्प के समान पुण्य प्रदान करने की क्षमता इस नगर की विरलता है जिसे यहाँ आ कर या यहाँ रह कर ही समझा और महसूस किया जा सकता है।
इस बार का कुम्भ आधुनिक कुम्भ है। किन्नरों की देवत्व यात्रा ने इसे समावेशी रंग भी दिया है। न्याय की इस नगरी ने जिसने सालों से न्याय पताका फहरायी है, उसमें अब कुछ दिनों तक अखाड़ों की धर्म-ध्वजा भी साथ में लहरायेगी। संगम की रेती जो ईंटों पर पड़ती है तो मकान बनाती है, वही जब माथे पर लगती है तो हमारे आध्यात्मिक आधार को सशक्त करती है।
मकर संक्रांति के साथ ही मेला शुरू हो रहा है। नगर अपनी गति से चलेगा। आजीविका अर्जन से लेकर रोज़मर्रा के समस्त कार्य होंगे। पुरुषार्थ(धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) की प्रबलता ही मानव जीवन का प्रतिबिम्ब है। किंतु, समाज की प्रगति हेतु समस्त कल्पवासियों की चालीस-दिवसीय तपस्या अपना असर अवश्य दिखायेगी। अर्थ और काम के पाटों को पार करते हुये मोक्ष अवश्य प्राप्त होगा।
माँ गंगा की अनुग्रहित संतानों के रूप में यह आवश्यक है कि हम इस कुम्भ को अपने तप, प्रेम एवं सौहार्द से भर कर भारतीय संस्कृति की अक्षुण्णता को बनाये रखें।
मनुष्यता के आन्तरिक प्रश्नों के उत्तर की खोज हेतु आयोजित इस प्रायोजन के महान आरंभ के साथ ही कई कहानियां और आत्ममंथन अनवरत आते रहेंगे। हम सब उनके सक्रिय साक्षी बने, यही हमारा प्रयास होना चाहिये।
पढ़ते रहिये, कहानियाँ आती रहेंगी और उनमें भावों का बहाव भी संगम की तरह सब अपने में मिलाता रहेगा।
!!हर हर गंगे!!
यहाँ भी पढ़ें- https://bit.ly/2STI1LY

Leave a Reply