निराकार

– अशान्त ·

– Ashant ·

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जब प्रेम हमारा निश्छल था 

फिर क्यों न वो साकार हुआ,
न रूंदन था न क्रंदन था 
फिर भी न कुछ आकार हुआ। 
निज तप में तप कर हम दो 
जब हुये थे उस पावन क्षण एक, 
न मिले हाथ पर हृदय मिले दो 
भाव प्रस्फुटित हुये थे अनेक। 
 
उस क्षण कहा था कण-कण ने 
मिट जायेंगे जीवन के हर संताप,
बात की थी दो नयनों ने 
धुल गये थे मन के संचित पाप। 
जन्मों का सम्बन्ध था तुमसे नैना 
कैसे तुम यूँ क्षण में ही रूठ गयी,
अमर भावों की माला को पहना 
मोती सी तुम क्यों टूट गयी?
है खोज मेरी अब अंतहीन 
कहाँ अब तुम्हारे स्वर ढूढूँ मैं,
मैं जब हुआ तुझ में सतत विलीन 
कहाँ स्वयं को अब ढूढूँ मैं। 
तुम्हारी एक अधर की रेखा पर 
हम जीवन अपना हार गये,
जो भाव सभी सब संचित थे 
वो सब तुम पर वार गये। 
फिर प्रिये, एक मरीचिका सी 
क्यों तुम मुझसे दूर हुयी,
ये कैसी विभीषिका विकट सी 
सब जाना फिर भी क्रूर हुयी। 
पर जितना प्रयास कर लो तुम 
नहीं शुष्क होगा निर्झर प्रेम का,
जो बीज पड़े हैं स्वतः क्षेम के 
सदा उर्वर रहेगा उपवन प्रेम का। 
नहीं मिलाप नियति में अगर 
है धैर्य मुझ में भी अटल अपार,
नहीं देह रहेगी मद्धिम होंगे स्वर 
मिलना होगा उस जन्म में उस पार। 
तब आना तुम सज्जित हो पुष्पों से 
पहन अकथित भावों के आभूषण,
मैं दर्शन कर ध्याऊँ अश्रु-पुष्पों से 
द्वय भावों से जीवन करूँ विभूषण। 
है अखंड प्रतीक्षा अखंड प्रेम की 
जो नहीं समाप्त हो मर्त्य जीवन सी ,
है अखंड ज्योति अनंत हेम सी 
जीवन करती शोभित प्रखर किरण सी। 
प्रतिक्षण होता ह्रदय अशांत अशांत 
तुम शान्ति की अनंत संभावना हो,
नैना हृदय-नयन तुम्हारे शांत शांत 
तुम मुक्ति की अनंत संभावना हो। 
है मेल सुनिश्चित सूक्ष्म स्तर पर 
स्थूल अश्रु सब बहने दो,
प्रेम अंकित जब तक न प्रस्तर पर 
भावों को अविरल बहने दो। 
जब प्रेम हमारा निश्छल था 

फिर क्यों न वो साकार हुआ…… 
– अशान्त 

– अशान्त

– Ashant

अशान्त की चिट्ठी

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Comments

One response to “निराकार”

  1. akinchan avatar

    Waah bhot khub

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