बाहर का सब सच
बन्द आँखों से अंदर ही दिखाई देता है
सब लिख जाता है सरकारी रजिस्टर पर
अधकचरी भाषा में-
न कोई विन्यास
न कोई व्याकरण;
आज कोशिश की उसी को पढ़ने की
कोई पक्षपात न हो इसलिये
नज़र का चश्मा भी उतार दिया
पर कुछ मिनटों में ऊब गया दिल
कभी कुछ समझ न आया
समझ आया तो खुद को न भाया
और आखिर में तोड़ कर खूँटा भाग गया
मन की भाग जाने की पुरानी आदत है।
– अशान्त

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