मन

– अशान्त ·

– Ashant ·

· in

बाहर का सब सच
बन्द आँखों से अंदर ही दिखाई देता है
सब लिख जाता है सरकारी रजिस्टर पर
अधकचरी भाषा में-
न कोई विन्यास
न कोई व्याकरण;
आज कोशिश की उसी को पढ़ने की
कोई पक्षपात न हो इसलिये
नज़र का चश्मा भी उतार दिया
पर कुछ मिनटों में ऊब गया दिल
कभी कुछ समझ न आया
समझ आया तो खुद को न भाया
और आखिर में तोड़ कर खूँटा भाग गया
मन की भाग जाने की पुरानी आदत है।

– अशान्त

– अशान्त

– Ashant

अशान्त की चिट्ठी

Letters from Small City Thinker. New writing, straight to your inbox.

Comments

Leave a Reply