पन्नों पे बिखरी स्याही देख के एक दिन
ख़्याल कहीं से कुछ आया ऐसा
क्या ये लिखावट मेरी ही है?
क्या मैंने ही लिखी थी ये कहानी?
फिर कुछ डर ऐसा आया दिल में
जो अनजाना हो बैठा मैं खुद से
पूछ बैठा फिर कुछ खुद ही खुद से
आख़िर, कौन हूँ मैं?
किताबों में रंगी हुयी लाइनें
पीले पड़ गये पुराने नोट्स
डायरी में अधपकी कवितायें
जो बाहर नहीं आयी वो भावनायें
रेस का हारा हुआ घोड़ा
झाग बहुत सारा साबुन थोड़ा
जो खुद को ही पहचान सके ना
आख़िर, कौन हूँ मैं?
क्या मेरे सपने सिर्फ़ मेरे हैं?
क्या मेरे लक्ष्य सिर्फ़ मेरे हैं?
ये जो साँस ले रहा हूँ मैं?
क्या ये सिर्फ़ मेरी है?
नहीं पता जब मुझको ही कुछ
पूछता हूँ मैं तब
आख़िर, कौन हूँ मैं?
और नहीं पता जब कुछ
क्या कह दें
क्या लिख दें
और किस से कह दें, कि
तुम मेरे हो;
रूह जिस्म का तानाबाना
बिखरा मोती राग पुराना
क्या रख लूँ पास मेरे मैं
जीवन जब बस आना जाना,
मैं खो गया अपनी ही गलियों में
जहाँ रहा करता था कभी मैं
न मिला वो घर और न ही मैं
आँखें बंद कर निकले दो आँसू
शीशे से चमकते उनको देखा
फिर उनमें ख़ुद को भी देखा,
पूछ रहा था उस पार से कोई
आख़िर, कौन हूँ मैं?
– अशान्त

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