दुःख है! हाँ, बहुत दुःख है!
पर अपनी ही बनायी हुयी
कैसे फेंक दे कोई चीज़
अपनी ही बनायी हुयी?
इंसान नहीं फेंक पाता
अपनी आँख,कान, नाक, चमड़ी
और हृदय….
तो कैसे फेंक दे
अपना पाला हुआ दुःख,
वो दुःख जो लिपटा है प्रेम में।
जान लीजिये
दुःख देता है पूर्णता को प्राप्त प्रेम
जब साथ नहीं आ पाता।
पर प्रेम का बीज
खिलाता है नव वल्लरियाँ
तुम्हारी पहली हँसी की तरह।
असंभव है तुम्हें दूर करना
क्योंकि तुम भी अब जैसी हो
मेरी ही बनायी हुयी हो।
भावनाओं के सब रहस्य
काले पड़ कर
बन गये हैं तुम्हारे चेहरे के तिल
जिन्हें हल्का न कर सके
दुःख के अनवरत अश्रु
हृदय के सारे प्रयास-
नियति हमेशा से क्रूर थी!
अगली बार जब दुनिया में आऊँगा
तो सीखूँगा कुरेदना प्रेम को
जो लिपटा हुआ है दुःख में
मुझे विश्वास है
मिट जायेगा दुःख का स्वत्व
तुम्हारा हँसता हुआ मुख
ही बनेगा मेरी मुक्ति का माध्यम।
– अशान्त

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