बहुत दिनों बाद आज आँधी आयी थी-
चेहरे पर,
आँखों के कोरों में,
बालों में,
खिसखिसाते दाँतों में,
धूल जम गयी है; पर
सबसे बुरा ये हुआ
सालों की सहेजी रद्दी उड़ गयी।
कितनी पुरानी अनपढ़ी खबरें
अनदेखे इश्तेहार
तुम्हारे सॉल्व किये सुडोकु
छज्जे पे बीती रविवारी दोपहरी
टहलते हुये पढ़ी-सुनी हुयी कहानी
तुम्हारी सिगरेट का सुलगता हुआ स्टब
जिसे चाह कर भी मैं उठा नहीं पाया था,
एक साधारण जीवन की आस-
सब उड़ गया आज।
कल कोई भूखा बच्चा बिन लेगा उनको
छँटनी करेगा सब कागज़ की
क्योंकि, उसके बचपन में
कॉपी से फाड़ कर बनायी हुयी नावें नहीं हैं ;
एक छोटी सी कविता जो लिखी थी कोने में
कुछ सपनों का इज़हार भी था
नहीं मिलेंगे वो दोनों उस बच्चे को
क्योंकि,
आज भी जन्म बहुत कुछ तय कर देता है।
ऐसा नहीं है कि रद्दी के उड़ जाने से
कुछ नया हो गया जीवन में
यादें गयीं पर कुछ आया नहीं
जो उड़ गया क्या वो सिर्फ रद्दी था?
अगर था तो अब तक बिका क्यों ना था?
उस टूटे हुए कूलर की तरह!
कागज़ पर लिखे शब्द उसे कर देते हैं भारी
तभी तो बन गया था
एक तिमंजिला मॉडल बालकनी में मेरी।
अभी भी मेज़ पर
कुछ अख़बार
कुछ किताबें
कुछ पत्रिकायें
कुछ डायरियाँ
कुछ तुम
कुछ हम
फैले हुये हैं,
क्या ये सब भी उड़ जायेंगे किसी दिन
रद्दी की तरह?
– अशांत

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