वो डोर कहाँ टूटी ही थी

– अशान्त ·

– Ashant ·

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वो डोर कहाँ टूटी ही थी
जिसको तुम टूटा जान रही हो
वो बात कहाँ भूली ही थी
जिसको तुम भूला मान रही हो
और कहाँ बदला था कहीं कुछ
जिसको तुम बदला मान रही हो
साल दो साल होते ही क्या हैं
सोचो तो बहुत सोचो तो ना कुछ
कुछ याद करो उन परिंदों को
जो उड़े थे घर से संगम की तरफ
और बिछड़े थे बीच राह
मिले थे फिर ना कितने बरस
पर देखो कितने माघों के बाद
वो उड़ रहे है साथ करते हुए प्रेम किल्लोल
संगम के सघन आसमान में।

हम तो बेहतर हैं उन परिंदों से
कह-कर सकते हैं बहुत
कुछ पहचानो मेरी भी बात
मैं हूँ वही जैसा था कभी
और अब तो काबिल जुलाहे की तरह
सिल दी है चादर मैंने प्रेम की
ना दिखती है कोई गाँठ,
ना ही अधूरी कोई डोर,
चमकता है बहुत दूर से,
ज़री सा सुन्दर हमारा प्यार।

-प्रशांत 

– अशान्त

– Ashant

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