एकपक्षीय निर्णय

– अशान्त ·

– Ashant ·

· in

किसी पेड़ के तने की तरह
तुम मेरे जीवन की स्थायी आशा नहीं थे
तुम फूल थे
तुम्हें मुरझाना ही था,
जिसे तुमने प्रेम समझा
वो अभिव्यक्ति थी आत्म-ग्लानि की
मेरे पूर्ण जीवन में तुम्हारा सिसकता चेहरा
मुझे अच्छा नहीं लगता
मैं क्या करती उसके सिवा
जो मैंने किया
एक अच्छे लिबास से हटानी पड़ती है
अनचाही कतरन।

तुम एक रोमांच थे
चाहिये होता है स्थायित्व
जिसके ख़त्म होने के बाद,
मैंने इसलिये तुम्हारी हर मनुहार
निर्ममता से ठुकरा दी,
मेरी सफलता को चिपचिपा कर देती थीं
तुम्हारी अव्यवहारिक मीठी बातें
इसलिये मैंने तुम्हें दूर कर दिया।

तुमने मुझसे कभी ऊँची आवाज़ में बात नहीं की
तुमने कभी मुझ पर नहीं जताया अपना हक़
तुम मेरे लिये कभी किसी से नहीं लड़े
तुमने कभी मेरे लिये किसी को गाली नहीं दी
तुम कभी मेरे घर भी नहीं आये
तुमने मुझे कभी कुछ नहीं दिया
जो एक पुरुष करता है स्त्री के लिये
तुमने वो कुछ नहीं किया;
सजा लिये हैं तुम्हारे बेमानी शब्द
कभी मन ऊबा तो पढ़ लूँगी उनको
तुम इतने कमज़ोर हो कि
मेरा साथी तुम्हें अपना प्रतिद्वंद्वी भी नहीं समझता।

बात यही है कि
जीवन चलता है-
सत्ता से
शक्ति से
पैसों से;
तुम्हारे बोझिल सपने
वो कंकड़ हैं जिन्हें नदी पीछे छोड़ जाती है
तुम्हारे अंदर नहीं है
पुरुष की स्वाभाविक आक्रामकता
इसलिये बंद अदालत में
समाज की आड़ लेकर सुना दिया मैंने
एकपक्षीय निर्णय-
तुम कमज़ोर हो तुम मेरे नहीं हो सकते;
यही न्याय है
मैं न्याय की देवी हूँ!

– अशान्त

– अशान्त

– Ashant

अशान्त की चिट्ठी

Letters from Small City Thinker. New writing, straight to your inbox.

Comments

2 responses to “एकपक्षीय निर्णय”

  1. Mikky Singh avatar

    The true story of one sided love. You are the magician of words…..

    Like

  2. Mikky Singh avatar

    This comment has been removed by the author.

    Like

Leave a Reply