सुबह नये साल की

– अशान्त ·

– Ashant ·

· in

कशमकश भरी है सुबह इस नये साल की
ज़िन्दा है सब यादें हर बीते हुये साल की

इत्तेफ़ाक़न कोई सिक्का मिल जाये सड़क पर
होती नहीं ताईद वो हयात-ए-मालामाल की

शादाब हैं बस चार पत्तियाँ पौधे की तुम्हारी
दे रहीं हैं गवाही मेरे हालात-ए-पामाल की

कोई कुछ कर देता मुरव्वत तो जी लेते हम
नहीं ख़्वाहिश हमें किसी नुमाइश-ए-मिसाल की

तुम्हारी हँसती तस्वीर को आख़िर देखे कब तक
नहीं बुझती हसरत तेरे दीदार-ए-जमाल की

आज वही शख़्स हमसे कुछ यूँ बेज़ार है
जिसे फ़िक्र थी हर पल कभी हमारे हाल की

कोई कुर्बत में नहीं रहता हयात-ए-तमाम
सच्चाई यही है ज़िन्दगी के जंजाल की

अब तुम्हें कहे अच्छा कोई अगर “अशान्त”
कहना नहीं ज़रूरत तुम्हारे इस ख़याल की

– अशान्त

– अशान्त

– Ashant

अशान्त की चिट्ठी

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