अतल अथाह कष्ट जीवन के
होते स्वयं से नित नूतन संग्राम,
खोलो द्वार अब तो आशा के
कुछ कष्ट हरो अब मेरे राम।
प्रेम के सब सूखे हैं झरने
सूखा हृदय है सुबह-शाम,
कृपा-सरिता को दो अब बहने
तृष्णा हरो अब मेरे राम।
बातें कर कर ये मन हारा
व्यर्थ गया यह जीवन तमाम,
अंत करो सब व्यतिक्रम हमारा
अवगुण हरो अब मेरे राम।
अश्रु नवीन बहते आंखों से
जीवन में दुःख करते हैं विश्राम,
नहीं मोह जीवन में धन से
जीवन सरल करो अब मेरे राम।
सही न जाये पीड़ा मेरी
तेरी शरण पड़ा मैं राम,
निशक्त हो गयी चेतना मेरी
नव सृजन दो अब मेरे राम।
ढूँढ़ा तुमको बाहर अंदर
कहाँ छिपे बैठे हो श्री राम,
दर्शन दो इस जीवन के अंदर
नहीं तो मरण दो अब मेरे राम।
– अशान्त

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