मेरी किताब के पहले पन्ने पर लिखे लफ़्ज़
मेरे नहीं तुम्हारे हैं
आज कल कलम की नोंक
मुड़ जाती है उधर
जिधर तुम्हारी आँखें मुड़ जाती हैं;
कई बरसों से मुझे नींद नहीं आयी है
जो किसी ने नहीं पूछे
वो सवाल परेशान करते हैं
कोई सपना मंज़िल तक पहुँचता नहीं
तुम सो जाओ शायद मुझे भी आराम मिले।
वो सुर्ख़ आवाज़ तेरी
न जाने किन मसलों में बट गयी है
बहुत दिन हुये जाना
कुछ खुल के हमसे बोलो तो ज़रा
न जाने कब से हमने जिरह नहीं की है;
और कुछ मुमकिन ना हो तो
ओढ़ लो हमको बना कर पैरहन
समेट के रखना हमें जब अलमारी में
सिलवटें रहने देना न उन्हें हटाना तुम
वही तो मेरी अनछुई मोहब्बत की निशानी है।
– प्रशान्त

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