मेरा चाँद

– अशान्त ·

– Ashant ·

· in

मेरा चाँद आसमान में नहीं
मेरे दिल में निकलता है,
मेरा चाँद सुबह शाम से परे
हर पल मेरे दिल में पिघलता है,
मेरा चाँद जब आता है आँखों में
सुलझाता है गिरहें ज़िन्दगी की।

मेरे चाँद में कोई दाग़ नहीं है
कभी-कभी उसे नज़र लग जाती है,
मन भर देखता नहीं उसे
बंद आँखों से ही छू लेता हूँ,
मेरे चाँद को छूने का एहसास
ठंडक नहीं गर्माहट देता है,
आज ही छुआ है मैंने उसके गालों को
प्रेमी बन मूक कविता कर रहीं हैं अब तक
मेरी हथेली मेरी उंगलियाँ।

मुझे कुछ मिले या न मिले
मेरे सपनों के गुल खिलें या न खिलें,
बस इतना दे देना तुम मुझे या रब
इंतेज़ाम बस इतना हो जाये,
मेरा मेरे चाँद पर
एक छोटा सा घर बन जाए!

– अशान्त

– अशान्त

– Ashant

अशान्त की चिट्ठी

Letters from Small City Thinker. New writing, straight to your inbox.

Comments

Leave a Reply