सूखी डाल पर बैठा कौवा
देख रहा खिड़की के पार,
एक मेज पर सोती कलमें
जिनमें छुपे भाव अपार।
कौवे ने ऊंची तान में पूछा
बना सकते क्या मेरा आकार?
सुंदर सा दिखता हूँ क्या मैं?
मिल सकता क्या मुझको प्यार?
कोई कलम न जब बोली उस से
बदला जब न उनका व्यवहार,
खिड़की की देहरी पर पहुंचा
कि अब हो जाये आर या पार!
पिया सिर्फ़ क्या मैने पानी
ला कर पत्थर नदिया के पार,
क्यों लिखी कहानी मुझ पर तुमने
बिन पूछे किया क्यों मेरा व्यापार।
काला-कर्कश कह कर तुमने
दिया क्यों मुझे विकृत उपहार,
सृष्टि का स्रष्टा जब एक है
अंतर सब में क्यों इतना अपार!
कोयल काली पर मीठी है
कौवा आखिर क्यों हुआ बेकार,
कुछ-कुछ अलग रहना औरों से
यही है जीवन का असली आधार।
– प्रशान्त

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