फाल्गुन में नयी बयार चली
कलियाँ नये रंगों में खिली,
हृदय आज सब उल्लसित हैं
कुछ ऐसे हैं जो विचलित हैं,
मैं कब से बेरंग बैठा हूँ
मुझ पर भी रंग डालो राम।
पैदा हुआ था जब मैं
कोई मेरा रंग न था,
भाव-प्रणय सब देखा मैंने
जीवन-समर सब देखा मैंने,
मैं अब भी बेरंग बैठा हूँ
मुझ पर भी रंग डालो राम।
सफल चपल सा एक रंग है
विफल होना भी एक रंग है,
मिलना कुछ एक रंग है
खोना भी तो एक रंग है,
मैं अब भी बेरंग बैठा हूँ
मुझ पर भी रंग डालो राम।
सोच नयी हो नया रंग हो
कर्म-प्रधान पुरुषार्थ रंग हो,
संताप-हरण का नया रंग हो
जीवन-आनंद सा सब रंग हो,
मैं कब से बेरंग बैठा हूँ
मुझ पर भी रंग डालो राम।
–प्रशान्त

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