सोचता हूँ कि
रावण बन जाऊं
क्योंकि, आज कल
सरल तरीके से
राम के मिलने की
संभावना कम है।
कुछ बुरा नहीं है
रावण बनना भी,
वो ज्ञानी था
वो सफल था
वो समृद्ध था
वो समर्थ था;
आज भी तो पूजते हैं
सब इन्हीं गुणों को,
फिर क्या बुरा है
रावण बनने में?
हाँ,
मैं नहीं करूंगा
किसी नारी का अपहरण
क्योंकि,
प्रेम मूल्य नहीं रहा
एक सामग्री है
जो खरीदी जा सकती है
किसी भी दूकान से
विभिन्न रूपों में,
वो भी बिना तोड़े
समाज का कोई नियम!
पर क्या राम आएंगे?
कहीं ऐसा न हो
कि मुझे जिन्दा जला दे सब
खुश हो ले दशहरे पे
और,
मैं जल जाऊँ बिना मुक्ति के,
पर ये भी सही रहेगा शायद
आख़िर,
इतिहास में नाम लिखाने की दौड़ में
जो सबसे आगे है आज
वो भी पीछे छूट जायेगा।
कहाँ होता है ऐसा रोज़
कोई रावण जल जाये
न राम के सशस्त्र तेज से
अपितु,
अपने ही प्रकोप से।
-प्रशान्त

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