दर्द ना समझे जाने का

– अशान्त ·

– Ashant ·

· in

क्या कभी सोचा है 

क्यों मुरझा जाता है 
कोई ग़ुलाब 
जैसे कभी खिला न हो 
सुनो कभी सूखी गिरी पंखुड़ियों को 
कहती हैं 
उन्हें बदलते मौसम ने 
कभी समझा नहीं। 
क्या कभी सोचा है 
क्यों मर जाती है 
कोई प्रतिभा 
जैसी कभी रही ही न हो
सुनो कभी असफलताओं को 
कहती हैं 
उन्हें कुटिल व्यवस्था ने 
कभी समझा नहीं। 
मृत्यु देह की नहीं होती 
इतनी दर्दनाक 
जितनी, होती है 
मन की;
नहीं बड़ा होता कोई दर्द 
ना समझे जाने के 
दर्द से बड़ा। 
-प्रशान्त   

– अशान्त

– Ashant

अशान्त की चिट्ठी

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