क्या कभी सोचा है
क्यों मुरझा जाता है
कोई ग़ुलाब
जैसे कभी खिला न हो
सुनो कभी सूखी गिरी पंखुड़ियों को
कहती हैं
उन्हें बदलते मौसम ने
कभी समझा नहीं।
क्या कभी सोचा है
क्यों मर जाती है
कोई प्रतिभा
जैसी कभी रही ही न हो
सुनो कभी असफलताओं को
कहती हैं
उन्हें कुटिल व्यवस्था ने
कभी समझा नहीं।
मृत्यु देह की नहीं होती
इतनी दर्दनाक
जितनी, होती है
मन की;
नहीं बड़ा होता कोई दर्द
ना समझे जाने के
दर्द से बड़ा।
-प्रशान्त

Leave a Reply