मिलन

– अशान्त ·

– Ashant ·

· in

सुना है बरसों पहले
बनारस से कोई नांव निकली 
संगम की तरफ 
पार कर के कितनी ज़मीन
कितने महासागर
कितने सूखे
कितनी बरसातें
कितने मौसम
आखिर उसे मिल ही गया
वो मांझी प्रेम का
मिलाने को उस धारा से
रुकी हुयी है जो बरसों से इसी आस में
कि तुम आ जाओ
तो आगे हम और तुम साथ चलें


-प्रशान्त

– अशान्त

– Ashant

अशान्त की चिट्ठी

Letters from Small City Thinker. New writing, straight to your inbox.

Comments

Leave a Reply