सुना है बरसों पहले
बनारस से कोई नांव निकली
संगम की तरफ
पार कर के कितनी ज़मीन
कितने महासागर
कितने सूखे
कितनी बरसातें
कितने मौसम
आखिर उसे मिल ही गया
वो मांझी प्रेम का
मिलाने को उस धारा से
रुकी हुयी है जो बरसों से इसी आस में
कि तुम आ जाओ
तो आगे हम और तुम साथ चलें
-प्रशान्त
बनारस से कोई नांव निकली
संगम की तरफ
पार कर के कितनी ज़मीन
कितने महासागर
कितने सूखे
कितनी बरसातें
कितने मौसम
आखिर उसे मिल ही गया
वो मांझी प्रेम का
मिलाने को उस धारा से
रुकी हुयी है जो बरसों से इसी आस में
कि तुम आ जाओ
तो आगे हम और तुम साथ चलें
-प्रशान्त

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