आईना देखता हूँ रोज़
तलाशने चेहरा अपना
पर हर रोज़ ही,सामने
कोई और शख्स
खड़ा नज़र आता है
तलाशने चेहरा अपना
पर हर रोज़ ही,सामने
कोई और शख्स
खड़ा नज़र आता है
निकलता हूँ जब घर से
ढूँढने इंसान कोई जैसे अपना
अफ़सोस, हर रोज़ ही
हर शख्स
मुझसे जुदा नज़र आता है
शोहरत,रसूख तय करते हैं
आज कीमत जब इंसान की
है रश्क,जो समझना था बहुत पहले
वही राज़
मुझे आज समझ आता है
-अशांत

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