संगम

– अशान्त ·

– Ashant ·

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प्रस्तुत लघु-कथा एक कल्पना मात्र है। किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति या किसी वस्तु से किसी भी प्रकार की समानता, मात्र एक संयोग है। लेखक का आशय किसी भी विचारधारा या मनुष्य को चोट पहुँचना कदापि नहीं है।

दिसम्बर की ये सर्द सुबह लाखों आवाजों से भरी हुई थी। इंसानों का हुजूम कोहरे की घनी चादरों को हराते हुए अपने गंतव्य की ओर निरंतर प्रगतिशील था। ऐसा लग रहा था जैसे प्रकृति और मानवीय आस्था के बीच परस्पर युद्ध चल रहा हो। प्रकृति की ओर से किये गए ठन्डे वारों का जवाब देने की कोशिश बूढ़ी सांसें लगातार कर रही थी। रुक-रुक कर उठता हर-हर गंगे का उद्घोष मीलों दूर तक सोये हुए अनगिनत हृदयों को रोमांचित कर रहा था।
इसी धर्मानुगामी समूह का हिस्सा कमला भी है। कल से त्रिवेणी पहुचने के लिए जो यात्रा शुरू की है वो अभी भी चल ही रही है। ५ ५  साल की उम्र में भी उसकी चपलता शहर की महिलाओं के लिए रहस्य से भी कम ना थी। उसकी नैसर्गिक चपलता को पाने के लिए हर सुबह-शाम  शहर के कंपनी गार्डन में ना जाने कितने ब्रांडेड जूते-चप्पल घिसे जाते हैं, किन्तु ये स्वाभाविक भारतीय चपलता नहीं मिल पाती। कारण तो पता नहीं लेकिन शायद परिवार के पालन में किये गए सारे क्रम-व्यतिक्रम हमारे गाँव की महिलाओं को शारीरिक एवं मानसिक तौर पर ठोस बना देते हैं। मजाल है कि हर साल माघ में कुछ दूरी पैदल तय करने वाले ये पैर कुम्भ में मीलों चलने के बावजूद थक जाएँ। और इस बार तो उत्साह दुगुना था, क्यूंकि उसकी  जवान बेटा लल्ली खुद अपनी माँ को मोक्ष की यात्रा पर लायी  थी।
पर शरीर अब जवानी की नहीं रही। पति की मृत्यु के बाद कमला अन्दर से टूट गई थी। लेकिन लल्ली को पालने के लिए जीने का उपक्रम चलता रहा। साथ ही चलती रही हर साल माघ में अमावस्या के दिन त्रिवेणी में स्नान हेतु यात्रा। इस अपेक्षा में कि शायद प्रयाग की इन्ही सड़कों पर चलते- चलते स्वर्ग के उस दरवाजे पर पहुँच जाए,जहां पर सच में तो पता नहीं,पर उसके विचारों में उसका पति जा ठहरा है। जब चलना एकदम मुश्किल हो गया तो भीड़ के रेले से अलग हो कमला सड़क के किनारे बैठ गयी।
“अरे अम्मा! का हुआ? थक गयी का?”, लल्ली ने खड़े खड़े पूंछा।

“हाँ लल्ली ! अब चला नहीं जा रहा, लगता है जैसे पैरों में जान नहीं है”, जवाब देते हुए कमला अपने निष्प्राण पैरों को खुद ही दबाने लगी।

बी . ए . पास लल्ली, जो अब सरकारी क्लर्क भी थी , नीचे माँ के पास बैठ गयी और शायद पिछले कई वर्षों में उसने पहली बार माँ के पैरों को देखा। वही पैर जो बचपन में लाल रहा करते थे आज बिवाइयों से भरे पड़े थे। ये बिवाइयाँ उसकी माँ के संघर्ष के अमिट सबूत थीं। उन्हें देख कर लल्ली का मन पछतावे से भर गया। अपनी पढ़ाई और सफलता की चाह में डूबे हुए उसे कभी पता ही नहीं चला कि माँ भी थकती है।

इसी ग्लानि से भर कर ही शायद उसने कमला के पैर पकड़ लिए और कहा “ला अम्मा ,तेरे पैर दबा दूं,थोड़ी  दवा लगा ले, आराम कर लें, फिर आगे बढ़ते हैं।”

कमला कुछ कह पाती इससे पहले ही लल्ली ने अपने पर्स से क्रीम निकाल कर माँ के पैरों पे लगाना शुरू कर दिया और उसके पैर दबाने लगी। बगल से भीड़ बिना कुछ दायें बायें देखे आगे बढती ही जा रही थी। उधर सड़क किनारे आज के इस बर्बर भौतिकवादी युग में सबला बेटी अपनी माँ के आजीवन प्रेम का ऋण चुका रही थी।

वाजिब मौका देखते ही कमला के ममत्व ने बिटिया से विनती की, “बिटिया, अब तुम्हारी नौकरी भी लग गई है, अब शादी कर लो और हमें हमारी सारी ज़िम्मेदारी से मुक्त करो।”

कमला ने जैसे लल्ली के मन की बात कह दी। इस बार घर आते वक़्त लल्ली ने माँ को अनुराग के बारे में बताने का दृढ निश्चय किया था। बहुत से डर थे लल्ली के ह्रदय में। बिन बाप की बेटी,गरीब माँ,खुद कम उम्र की, कहीं ऐसा न हो की समाज की स्वीकृति या फिर खुद माँ की ही  मंजूरी न मिले इस रिश्ते को।

माँ के पैर दबाते हुए ही लल्ली ने अपनी मन की सभी गांठें खोल दी और अपने गाँव से दूर इस शहर में अनुराग के साथ अपने प्रेम और विवाह की इच्छा के बारे में विस्तार से बताना शुरू कर दिया। कमला भी टकटकी लगाए उत्सुकता से सब सुन रही थी, जैसे कोई बच्चा बचपन में राजा-रानी की कहानी सुनता है।

माँ-बेटी का  वार्तालाप चल ही रहा था कि सामानांतर एक वार्तालाप और चल रहा था। हालांकि दोनों वार्तालापों के बीच मौलिक अंतरों की भरमार थी।

कमला और लल्ली जहाँ बैठीं थीं वहीं पर सड़क के उस पार,निरंतर बढ़ी आ रही भीड़ से विभाजित, एक आलीशान लाल बत्ती लगी गाडी में माँ-बेटी की एक और जोड़ी बातचीत में मशगूल थी। हालांकि कमला-लल्ली के उलट यहाँ स्वर काफी ऊंचे थे। कदाचित इसलिए क्योंकि वो समाज के अभिजात वर्ग का प्रतिनधित्व कर रही थीं। उम्र दोनों की कमला-लल्ली के समकक्ष ही थी। अंतर बस ये था कि यहाँ माँ के पैरों में बिवाइयां नहीं थी और बेटी ने कोई बड़ी डिग्री ली हुई थी। और हाँ उसके हाथों में विदेशी कंपनी वाले “फ्रेंच फ़्राइस” थे,जिन्हें वो बतियाने के दौरान अनवरत चबा रही थी।

“क्या तुम अब भी प्रखर से बात करती हो?” कार के अन्दर बैठी हुई माँ ने अपनी बेटी से पुछा।

“नोट एट आल मम्मा, उसे तो मैंने कब का छोड़ दिया, बहुत इमोशनल लड़का था, नॉट माई टाईप”, मुस्कुराते हुए बेटी ने जवाब दिया। 

उत्तर सुनते ही माँ के चेहरे पे आयी चमक देखने लायक थी। ऐसा लगा जैसे कि  उनके द्वारा दी गयी परवरिश को बेटी ने सार्थक कर दिया। गर्व से बोलीं “गुड बेटा, मुझे तुमसे ऐसी ही उम्मीद थी। अपना करियर बनाओ, लड़के तो बहुत मिलते रहेंगे। और वैसे भी हम नए जमाने की औरतें हैं,हमें नारीवाद का ज्ञान है, हमारी पहचान खुद से है,ये सब भावनाओं के जाल में तो बेवकूफ फंसते हैं।”

माँ की बातों को सुनकर, फ्रेंच फ़्राइस के डिब्बे में हाथ डालते हुए बेटी ने पुछा, “तो मम्मा,ये  बताओ कि  आप डैड से प्यार करती हो कि नहीं? क्योंकि नारीवाद के हिसाब से तो डैड तो सिर्फ एक आदमी हुए जिनके साथ आप ज़िन्दगी गुज़ार रहीं हैं और ना कि कोई रिश्ता जिसको संचित किया जा सके।”

बेटी के मुंह से निकले इन यथार्थपरक वाक्यों ने जैसे माँ को भीतर तक झंकझोर दिया। इस एक छोटे से सवाल ने भारतीय सामजिक सरोकारों-जिनका भाग वो खुद भी थीं-पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह लगा दिया। 

कुछ देर चुप रहने के बाद, जब कोई जवाब समझ में नहीं आया तो माँ ने बेटी से झुंझलाते हुए कहा “मैं तुम्हारे भविष्य के बारे में पूँछ रही थे और तुमने बात ना जाने कहाँ पहुंचा दी।”

अपनी मौलिक सोच पर प्रहार होते देख बेटी ने प्रत्युत्तर में कुछ ज्यादा बोल दिया, जो कि माँ को और नागवार गुजरा। फलस्वरूप, कुछ देर पहले का बौद्धिक वार्तालाप एक झगडे में तब्दील हो चूका था जिसमे आधुनिकता और प्राचीनता के मध्य बैठे दो मनुष्य लड़ रहे थे। उस प्रश्न पर जिसका कोई जवाब ना था। हाँ, इस झगडे में वो प्रखर कहीं खो गया, जो इस वक़्त शायद कहीं किसी कमरे में बैठा या तो अवसाद में डूबा होगा या फिर किसी और लड़की के साथ वक़्त गुज़ार रहा होगा।

उधर कार में झगड़ा चल रहा था और इधर कमला ने लल्ली को गले लगा लिया था। दोनों के गाल आंसुओं से भीगे हुए थे। लल्ली की बातों से और अपने अनुभव से कमला को लगा की अनुराग बहुत ही अच्छा लड़का है और उसकी लल्ली के लिए सबसे अच्छा भी।

कमला ने लल्ली से बस इतना कहा “बिटिया अपने इस प्यार को कभी ख़त्म ना होने देना और इसे हमेशा यूं पावन ही रखना “, और उसके बाद ईश्वर को धन्यवाद देते हुए आगे बढ़ने को उठ खडी हुयी। लल्ली की बात और उसके हाथों से निकले प्रेम की अविरल धारा ने जैसे उसके थके हुए पैरों में नयी जान भर दी। अब उसे पूर्ण विश्वास था कि उसे मोक्ष अवश्य मिलेगा।

तभी कमला-लल्ली के बगल से वही लाल बत्ती वाली गाड़ी  आगे निकल गयी, जिसमे अभी तक झगडा चल रहा था। उन दोनों जोड़ियों का गंतव्य एक ही था -त्रिवेणी संगम। गाड़ी जल्दी पहुँच भी जायेगी वहाँ, लेकिन अपनी सोच और वास्तविक जीवन निर्वाह में कमला-लल्ली ने लाल बत्ती को कही बहुत पीछे छोड़ दिया था।   

– अशान्त

– Ashant

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