तुम चले जाओगे तब सोचेंगे,हमने क्या खोया हमने क्या पाया
आज संगीत की विधा ने एक चमकता हुआ सितारा सदैव के लिए खो दिया. ग़ज़ल-ए-आज़म जगजीत सिंह के लिए आज की सुबह उनके जीवन की आखिरी सुबह साबित हुई. उन्होंने इस नश्वर जगत को तो अलविदा कह दिया किन्तु अपनी महानता के परिचायक ऐसे असंख्य गीत छोड़ गए, जो आने वाली कई पीढ़ियों तक उन्हें दिलों में जिंदा रखेंगे. जगजीत औरों के लिए मात्र एक गायक और संगीतकार हो सकते हैं. किन्तु मेरे लिए वो एक ऐसे साथी के समान हैं जिसने मेरे अच्छे-बुरे वक़्त में हमेशा साथ निभाया और कभी दगा नहीं दिया. हर अवसर पर गुनगुनाने के लिए और दुःख एवं दुविधा के क्षणों में खुद को संभालने के लिए एक ऐसा जखीरा छोड़ गए जिसकी चमक कभी धूमिल नहीं होगी.
आलोचक उनकी और गायकों के साथ तुलना कर सकते हैं. किन्तु मेरी पीढ़ी और मेरे लिए जगजीत अद्वितीय हैं और हमेशा रहेंगे. जगजीत सिंह से मेरा रिश्ता सन २००३ में उनके प्रसिद्ध गीत “होठों से छू लो तुम” के माध्यम से जुड़ा. पहली बार इस गीत को ध्यान से तभी सुना था. हर बार सुनने पर एक नया मतलब समझ आता था. इस से पहले जगजीत सिर्फ अखबारों और लोगों की बातों द्वारा ही मुझे ज्ञात थे. इस गीत के हर एक शब्द पर की गयी “मखमली हरकत” दिल को जैसे सहला सा देती थी. मुझे ये नहीं पता कि ये मेरी उम्र का असर था या संगीत का जादू, पर हाँ, इस एक गाने मुझे हमेशा के लिए बदल दिया था. मेरी सोच को विस्तृत करने के लिये इस गीत ने -जिसका वजूद जगजीत सिंह के बिना कुछ भी नहीं है न होता- चिंगारी का काम किया. उस समय इन्टरनेट सुलभ नहीं था इसलिए मामा से निवेदन कर कई सी.डी. में जगजीत की ग़ज़लों का इंतज़ाम किया, और सबको कई बार सुनते हुए एक सफ़र पर निकल पड़ा, जो आज तक जारी है. बहुत से कठिन शब्द समझ नहीं आते थे,फिर भी सुना और वो सुनने समझने की प्यास आज भले ही दब गई हो लेकिन बुझी नहीं है.
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि “धूम-धडाका” संगीत के दौर में हमारी पीढ़ी की माधुर्य से वास्तविक पहचान जगजीत द्वारा गायी गयी ग़ज़लों ने ही करवायी. आगे चलकर ग़ुलाम अली,मेहँदी हसन,तलत महमूद की लाजवाब अदायगी से भी वास्ता हुआ. तब एहसास हुआ की किस शिद्दत से काम कर,इन बड़े नामों के होते हुए, जगजीत ने “जग” को अपनी “ग़ज़लों” के जादू से “जीत” लिया. आखिर ऐसा क्या था जगजीत में जिसने लुप्त होती ग़ज़ल शैली को दुबारा मुख्यधारा में ला खड़ा किया? इसका सीधा उत्तर है “सरलता”! जगजीत ने अपनी सरल अदायगी से भारी अर्थ वाली रचनाओं को जनमानस तक पहुँचाया. अभिजात और माध्यम वर्ग में तो जगजीत जीवन का एक हिस्सा बन गये. ग़ालिब और फ़िराक को गाया तो बहुत से नामचीनों ने,लेकिन उन्हें लोगों के दिलों तक पहुँचाया और उनकी रचनाओं का अर्थ समझाया सिर्फ जगजीत ने. यह सरलता ही तो थी जिसने सिर्फ बड़ी महफ़िलों की शान कही जाने वाली ग़ज़ल को भागदौड़ की आधुनिक ज़िन्दगी के बीच लोकचेतना में आत्मसात कर दिया.
आधुनिक भारत के हर सच्चे आशिक ने जगजीत की ग़ज़लों को ज़रूर जिया होगा और कई कई बार जिया होगा. ना जाने कितने ही होस्टलों के कमरे इस मखमली आवाज़ में डूबे उतराए होगें. मोहब्बत की मासूमियत को इसी आवाज़ ने “प्यार का पहला ख़त” जैसी ग़ज़ल गाकर बरक़रार रखा. बचपन की यादों को “ये दौलत भी ले लो ये शोहरत भी ले लो “ गाकर जैसे फिर से जिंदा कर दिया. आवाम ने भी इस फनकार को तहेदिल क़ुबूल किया और बेपनाह मोहब्बत से नवाज़ा. ये बात सही है की जगजीत की आवाज़ शास्त्रीयता के पैमाने पर शायद उस ऊंचायीं को ना छू पाई हो जिसके वो काबिल थी. लेकिन जो कुछ भी इस आवाज़ ने अपनी कला के द्वारा पाया शायद ही किसी को मिला हो.
जगजीत की ग़ज़लों ने ना सिर्फ ग़ज़लों की दुनिया का गूढ़ तिलिस्म तोड़ा, बल्कि एक ऐसे प्रवेश द्वार का काम किया जिसके पार हर कोई जा सकता था. एक ऐसी दुनिया की ओर जहाँ सिर्फ मोहब्बत और इबादत थी और इंसानियत की खूबसूरती. मेरी(या फिर हम सभी की) तन्हाईयाँ के साथी जगजीत आज हमारे बीच नहीं हैं. पर ऐसा विश्वास करना मुश्किल है. मेरी उनको साक्षात सुनने की इच्छा अधूरी ही रह गयी. लेकिन आप जो कुछ हमको देकर गए हैं, उसे संजोकर रखना और कभी ख़त्म न होने देना बेहद ज़रूरी है. “लोक-ग़ज़ल” की जो आवाज़ आज ग़ुम हुई है, उम्मीद करता हूँ कि फिर पुनर्जीवित होगी.
तब तक जगजीत जी आपकी याद और सम्मान में कोटि कोटि नमन!


Leave a Reply