तकनीकी विकास का बच्चों पर दुष्परिणाम

– अशान्त ·

– Ashant ·

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विकास एक ऐसी दोधारी तलवार है,जिसका अगर विवेकपूर्ण उपयोग ना किया जाए तो वह हमारी उन्नति एवं आत्मरक्षा का साधन होने के बजाय विनाश का कारक भी बन सकता है.

विकास एक ऐसी प्रक्रिया है जो मनुष्य के जीवन की सार्थकता को सिद्ध करती करती है. मानव जाति को विश्वास दिलाती है कि वो इस पृथ्वी की सबसे शक्तिशाली प्रजाति है. वैकासिक प्रक्रिया सदैव से ही मानव सभ्यता का अंग रही है. विकास के कई प्रकार होते हैं. आत्मिक विकास, आर्थिक विकास, निज विकास इत्यादि कुछ उदाहरण मात्र ही हैं. किन्तु निस्संदेह! २१वी शताब्दी द्रुतगति से हो रहे तकनीकी विकास की साक्षी है और आने वाले कई वर्षो तक रहेगी. ऐसे में एक प्रश्न का उठाना बड़ा स्वाभाविक है; आखिर प्रगति के पथ पर ले जाने वाली विकास की  प्रक्रिया हमारे बच्चों को दिशाहीन कैसे बना रही है? आज आवश्यकता है कि   यथाशीघ्र इस प्रश्न का उत्तर खोजा जाए. हर चीज़ के दो पहलू होते हैं- अच्छा और बुरा. विकास की सार्थकता तभी है जब वह हमारे लिए हितकारी हो.मानवीय मूल्यों को हाशिये पर रख कर किया गया विकास, उन्नति नहीं अपितु अवनति का माध्यम है.
विकास कोई एकसूत्रीय योजना और कार्यक्रम नहीं जिसके निष्पादन के उपरान्त किसी भी प्रकार के रख-रखाव की आवश्यकता न हो. इसके सर्वव्यापी प्रभाव की परिधि में समाज के कई पहलू आते हैं. तकनीकी विकास द्रुत गति से आगे बढ़ता है; और उस से कदम मिलाने के फेर में हम कभी कभी उसके दुष्प्रभावों को नज़रंदाज़ कर देते हैं. तकनीकी विकास का सबसे बड़ा एवं बुरा असर समाज के नींव हमारे बच्चों पर सबसे  ज्यादा पड़ रहा है. बड़ों की अपेक्षा विवेक की कमी बच्चे तकनीक-सृजित छद्म वस्तुओं एवं वातावरण  को जीवन की सत्यता मान कर दिशाहीन हो रहे हैं.

इसके असंख्य उदहारण हम अपने समाज में जर तरफ देख सकते हैं. चाहे वह अदनान पटरावाला हत्याकांड हो या ‘शक्तिमान’ से प्रभावित हो, उनके “महामानवीय” कारनामों को दोहराने के प्रयास में मृत्यु की गोद में जाने वाले बच्चे. इसे हम दिशाहीनता नहीं तो और क्या कहेंगे!

सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आये आकस्मिक एवं असीमित विस्तार ने हमें (मुख्यतः अभिभावक) उस से जुड़े सामजिक और निजी जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव को समझने का समय ही नहीं दिया. गिल्ली डंडे की जगह  कब “वर्चुअल क्रिकेट” ने ले ली पता ही नहीं चला! टी.वी. पर आने वाले हिंसक एवं अश्लील कार्यक्रमों का बालमन पर अमिट प्रभाव पड़ता है. इन्टरनेट के माध्यम के दुरपयोग के किस्से अब आम हो चले है.मोबाइल और सोशल नेटवर्किंग की लोकप्रियता ने किशोरों के बीच कई समस्याओं को जन्म दिया है. खेल के मैदानों के बजाय आज कल बच्चे कम्प्यूटर स्क्रीन पर मिलते है. यह बचपन की मासूमियत के खून से कम नहीं. विकास की इस अंधी दौड़ में, टूटते परिवारों और माता पिता की ढीली पड़ती पकड़ ने हमारी बाल पीढ़ी को बहुत दिग्भ्रमित किया है.

किन्तु मेरे इस मत का का यह अर्थ कतई नहीं है मैं विकास विरोधी हूँ. विकास हमारी निजी, सामजिक एवं राष्ट्रीय प्रगति हेतु अत्यंत आवश्यक है. किन्तु इसके लिए हमें यह ध्यान रखना होगा की विकास आखिर किस रूप में हम तक पहुँच रहा है?उसका समाज की मूल इकाई – बच्चों- पर क्या प्रभाव पढ़ रहा है? तकनीकी विकास,आवश्यक है, किसान की सुन्दर फसल की भांति बढे और ना कि घातक जंगली झाड़ी की तरह!

यह हमारा कर्तव्य है कि हम संसाधनों का समुचित उपयोग राष्ट्र-निर्माण हेतु करें. इसके लिए बच्चों का सर्वांगीण विकास नितांत आवश्यक है. बच्चे भारत की आबादी एवं आत्मा का अहम् हिस्सा हैं. अगर हम उनकी क्षमता को बाजारवाद-प्रायोजित अंधे तकनीकी विकास के कारण दिशाहीन हो, नष्ट कर देंगे, तो यह हमारी पूर्व पीढ़ियों के प्रयासों का अपमान एवं उनके स्वप्नों पर घोर कुठारघात होगा.

बच्चे हमारी सबसे अनमोल पूँजी हैं जिसका हमें संचय एवं विकास करना होगा. इस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु आवश्यक है कि हम तकनीकी विकास कि चमक-धमक से प्रभावित हो, उसके प्रतिकूल प्रभाव भूल इस प्रक्रिया के ग़ुलाम न बनें. बल्कि हम अपने राष्ट्र के बच्चों को इस भेंड़चाल से बचाते हुए, ऐसे विकसित करें कि विकास की प्रक्रिया उनकी प्रतिभा एवं क्षमता की ग़ुलाम हो. तभी हम सही दिशा में चलकर अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकेंगे. और तभी हमारा राष्ट्र सही मायनों में विकसित राष्ट्र कहलायेगा.

अशांत

– अशान्त

– Ashant

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