इसके असंख्य उदहारण हम अपने समाज में जर तरफ देख सकते हैं. चाहे वह अदनान पटरावाला हत्याकांड हो या ‘शक्तिमान’ से प्रभावित हो, उनके “महामानवीय” कारनामों को दोहराने के प्रयास में मृत्यु की गोद में जाने वाले बच्चे. इसे हम दिशाहीनता नहीं तो और क्या कहेंगे!
सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आये आकस्मिक एवं असीमित विस्तार ने हमें (मुख्यतः अभिभावक) उस से जुड़े सामजिक और निजी जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव को समझने का समय ही नहीं दिया. गिल्ली डंडे की जगह कब “वर्चुअल क्रिकेट” ने ले ली पता ही नहीं चला! टी.वी. पर आने वाले हिंसक एवं अश्लील कार्यक्रमों का बालमन पर अमिट प्रभाव पड़ता है. इन्टरनेट के माध्यम के दुरपयोग के किस्से अब आम हो चले है.मोबाइल और सोशल नेटवर्किंग की लोकप्रियता ने किशोरों के बीच कई समस्याओं को जन्म दिया है. खेल के मैदानों के बजाय आज कल बच्चे कम्प्यूटर स्क्रीन पर मिलते है. यह बचपन की मासूमियत के खून से कम नहीं. विकास की इस अंधी दौड़ में, टूटते परिवारों और माता पिता की ढीली पड़ती पकड़ ने हमारी बाल पीढ़ी को बहुत दिग्भ्रमित किया है.
किन्तु मेरे इस मत का का यह अर्थ कतई नहीं है मैं विकास विरोधी हूँ. विकास हमारी निजी, सामजिक एवं राष्ट्रीय प्रगति हेतु अत्यंत आवश्यक है. किन्तु इसके लिए हमें यह ध्यान रखना होगा की विकास आखिर किस रूप में हम तक पहुँच रहा है?उसका समाज की मूल इकाई – बच्चों- पर क्या प्रभाव पढ़ रहा है? तकनीकी विकास,आवश्यक है, किसान की सुन्दर फसल की भांति बढे और ना कि घातक जंगली झाड़ी की तरह!
यह हमारा कर्तव्य है कि हम संसाधनों का समुचित उपयोग राष्ट्र-निर्माण हेतु करें. इसके लिए बच्चों का सर्वांगीण विकास नितांत आवश्यक है. बच्चे भारत की आबादी एवं आत्मा का अहम् हिस्सा हैं. अगर हम उनकी क्षमता को बाजारवाद-प्रायोजित अंधे तकनीकी विकास के कारण दिशाहीन हो, नष्ट कर देंगे, तो यह हमारी पूर्व पीढ़ियों के प्रयासों का अपमान एवं उनके स्वप्नों पर घोर कुठारघात होगा.
बच्चे हमारी सबसे अनमोल पूँजी हैं जिसका हमें संचय एवं विकास करना होगा. इस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु आवश्यक है कि हम तकनीकी विकास कि चमक-धमक से प्रभावित हो, उसके प्रतिकूल प्रभाव भूल इस प्रक्रिया के ग़ुलाम न बनें. बल्कि हम अपने राष्ट्र के बच्चों को इस भेंड़चाल से बचाते हुए, ऐसे विकसित करें कि विकास की प्रक्रिया उनकी प्रतिभा एवं क्षमता की ग़ुलाम हो. तभी हम सही दिशा में चलकर अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकेंगे. और तभी हमारा राष्ट्र सही मायनों में विकसित राष्ट्र कहलायेगा.
अशांत

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