कल ही की तो बात है
मैं गिरा था अपने घर के आँगन में
बस हलकी सी खरोंच ने
माँ को रुला दिया था
उस दिन दिल्ली में घायलों को
टी.वी. पर देखा तो सोचा
क्या बीती होगी इनकी माओं पर
मेरी चोट तो हल्दी से ठीक हो गई
पर यहाँ
घाव अभी ताज़ा है
दिल्ली की वजह से शायद
घटना बड़ी हो गई
कैमरे संसद की तरफ जाते हुए
हाई कोर्ट की तरफ मुड़ गए
नहीं तो इस देश में इंसानों;
खासकर गरीबों की क्या कीमत
मांस के लोथड़े है
जो कभी बम में फटते है
कभी ट्रेनों में पिसते हैं
या यूं ही गुमनामी में खो जाते हैं
पर कोठरी में बैठी उस माँ का क्या
जिसका बेटा इन्साफ की चौखट पर
बेमौत मारा गया
जिसकी मौत को रोकने के लिए
कोई अनशन नहीं हुआ
उस माँ के
घाव ताज़ा हैं,
और रहेंगे हमेशा,
जिसको सरकार कुरेदेगी रोज़
जांच के नाम पर
नहीं पड़ने देगी कोई पपड़ी
जिससे “आँसूं” रुक जाएँ
ना हो भरोसा तो जाकर देख लो
उस रोते घर को
घाव वहाँ अभी ताज़ा है
अशांत

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