बंदिशें कारगर ना हुईं इश्क में
मैं फना हुआ तुझमे मेरी जान
लाख कोशिश की अपनी हस्ती बनाने की
आख़िर में तुझमे हुआ फ़ना मेरी जान।
हर ख्वाहिश में बस यही होता है
कि मेरी चाहत का तू इस्तेकबाल करे
बातें परेशानी अपनी तू कहे मुझसे
कुछ ऐसा तू मेरा इस्तेमाल करे।
कोई ऐसी दवा काश देता खुदा मुझे
हर दीवार में मिलता तेरा दीदार मुझे
हर हवा में मिलती तेरी महक मुझे
हर ज़र्रे में काश देख सकता तुझे।
अपनी तड़प अगर नाप सकता मैं
तो उसकी हद तुझे दिखा देता मैं
इस जहाँ कि फ़िक्र अगर न होती तुझे
तो तुझे सबसे चुरा लाता मैं।
दूर अब तो ना कोई कर सकता है
इस तरह तू मुझमे समा चुकी है
मैं सच में तुझमें फ़ना हो चुका हूँ
तेरी हर साँस मुझ पर चा चुकी है।
अशांत

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