ये मेरा अपना शहर है
गवाह मेरी ज़िन्दगी का
इल्म है इसे मेरी हर बात का
जो छुपे है उन जज़्बात का
फ़िर भी यहाँ सुकून नहीं
जैसे हो कोई गैर और अपना नहीं।
ये मेरा अपना शहर है
यहीं पर बाचपन मेरा बीता है
इसी की सड़कों पर चलकर
जीवन का सबक मैंने सीखा है
फ़िर भी यहाँ सुकून नहीं
जैसे हो कोई गैर और अपना नहीं।
ये मेरा अपना शहर है
गवाह मेरी शोहरत का
कद्रदान मेरी गुरबत का
पर अब यहाँ मेरा कोई वजूद नहीं
जाने क्यों यहाँ सुकून नहीं
जैसे हो कोई गैर और अपना नहीं।
ये मेरा अपना शहर है
सौतेला है अब जिसका अपनापान
मेरे जज्बातों को न ये समझता है
हवाओं में भी इसकी है बंदिशें
जाने क्यों उनमे सुकून नहीं
जैसे हो कोई गैर और अपना नहीं।
अशांत

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