मैं जब भी गिरता ख़ुद ही उठ जाता था
माँ ने माँगी थीं बेपनाह दुआयें मेरे लिये
एक दौर बड़ी कशमकश थी ज़िन्दगी में
जब आये सुकून साथ लाये तुम मेरे लिये
मालूम हुयी वालिदैन की दी छत की क़ीमत
जब निकला शहर में ढूँढ़ने मैं घर मेरे लिये
बड़ी नफ़ासत है आज उनकी अदाओं में
ज़ुम्बिश है उनके लबों पर आज मेरे लिये
मैं जो भी करता हूँ अच्छे से हो जाता है
कोई चुप-चाप माँगता है दुआयें मेरे लिये
– अशान्त

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