कोई तो कमी रही होगी मुझ में
नहीं यूँ ही नहीं तू चला गया होता
यूँ तो सबके साथ तुम खड़े रहे
काश मेरे साथ कभी तू खड़ा होता
ज़माने की रिवायत निभाते हो तुम
मेरी सुन लेते तो बुरा बोलो क्या होता
चल रहा है कारोबार मेरा भी तेरा भी
रुक जाते तुम तो मैं अकेला नहीं होता
औरों की नज़र में बड़े बन जाओगे तुम
अपना छोटा सा घर होता तो क्या कम होता
बहाने फुरकत के हैं लिपटे ख़ाली लफ़्ज़ों में
गर समझा होता तो तू हरदम संग यहीं होता
मेरे लिये तुमने कभी कुछ नहीं बोला
मैं नहीं होता तो सब कुछ सही होता
मेरी उखड़ी साँसें नम आँखें दबी धड़कन
फ़र्क करती कुछ तू बेशक़ रुक गया होता
लोग कहते हैं मैं मैदान में नहीं उतरा
देखते मेरे ज़ख़्म मंज़र पता चल गया होता
ज़िन्दगी पता है तुम तो निभा लोगे
काश ये मशविरा हमें जम गया होता
बोल देते सच तो शायद रूह बच जाती
जीते जी यूँ ही न कोई मर गया होता
– अशान्त

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