ये कैसी आँख-मिचौली है
तुम जिसमें हमेशा छुप जाते हो
मैं तुम्हें कभी ढूँढ़ नहीं पाता हूँ।
किन शब्दों की बात कहूँ
जो दिल में रहे या पहुँचे तुम तक
मेरा लिखा अब तुम कहाँ पढ़ पाते हो।
नाम किसी का लेते हो तुम
पर जब वक़्त मोहब्बत का आता है
तुम मेरे जैसे बन जाते हो।
वो दोपहर तुमको याद है क्या
सब छोड़ के जब तुम आये थे
वैसे क्या किसी से मिलने जाते हो?
छन-छन कर सूरज की किरणें
तुम पर जो पड़ जाती थी
अब भी क्या तुम वैसे सुंदर हो जाते हो?
गंगा का पानी गर्मी में जो
चाँद सा शीतल चमकता है
नहीं होते तब भी तुम मुझको दिख जाते हो।
बहुत जीते हो इस खेल में तुम
लो अब मैं तुम में छुप जाता हूँ
देखेंगे क्या तुम मुझे ढूँढ़ फिर पाते हो!
चंचल प्रेम बहुत हँसा बोला तुमसे
शिथिल क्षणों में पर जब पहुंचा तुम तक
आकर्षण के पाश में तुम बंधे चले जाते हो।
ये कैसी आँख मिचौली है
तुम जिसमें हमेशा छुप जाते हो….
– अशान्त

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