मुक्काबाज़ में सुनैना को देखने समझने के बाद ये कुछ अपरिपक्व विचार आये जिनके आधार पर कोई व्यकितगत मूल्यांकन करना अनुचित होगा। एक भावनात्मक हृदय की अभिव्यक्ति को वास्तविकता और यथार्थ की कसौटी पर परखे बिना इसे पढ़ें…. क्योंकि भावनाओं का वास्तविकता के साथ कोई संबंध नहीं है। किसी भी प्रकार की समानता महज एक संयोग है जिसका मुझे खेद है।
प्रेम सत्य है
तो उसका मूल्यांकन पाप है,
जो अभिव्यक्त किया दबे मुँह
वो तुम्हारी अभिव्यक्ति मेरा सन्ताप है,
अलभ्य बनाना अपने प्रेम को
क्या कलियुग का कोई श्राप है?
अविचल सत्य है ये व्यवहार तुम्हारा
या बस मेरे लिये इतने नैतिक आप हैं?
तुम तो स्थिर हो न कि व्याकुल
फिर कैसा ये भावनात्मक विलाप है,
प्रसिद्धि प्रसाद नहीं
विपरीत परिस्थिति में अभिशाप है,
नैना तुम सुनैना बन जाओ
कुछ बोलो न बस लड़ जाओ!
– अशान्त

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