न मिले जिनसे हम न छुआ है कभी भी
रूठे दिलबर मेरे वो आज याद आ रहे हैं
न गिला है उन्हें है न शिकवा हमें भी
दस्तूर ज़माने के हमको रुला रहे हैं
मंज़िल मिले न मोहब्बत को कभी भी
ताउम्र उनकी पेशानी हम पढ़े जा रहे हैं
बैठ जाता है दिल उनके आँसू गिरते कभी भी
हथेलियों में जज़्बा-ए-सागर भरे जा रहे हैं
नज़र पल दो पल से ज़्यादा मिली न कभी भी
उन्हीं पल दो पल में गुज़ारा किये जा रहे हैं
बोलते वो रहें और सुनते उनको हम भी
ऐसी महफ़िल का इंतेज़ार किये जा रहे हैं
सुन लिया करो बात औरों की भी “प्रशान्त”
ख़ुद-मुनादी में सब अपने दूर हुये जा रहे हैं
– अशान्त

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