काश!

– अशान्त ·

– Ashant ·

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काश! सुलझ जाती कुछ उलझनें;
उंगलियों में घूमता हुआ वो धागा
तुमने उलझाने के लिये तो न लपेटा होगा,
गोरी उंगलियों पर लिपटी
काले धागे की कई परतें
अंगूठी है उस रिश्ते की
जिसे न किसी ने बनाया
न ही किसी ने पहनाया।

काश! समझ आ जाती कुछ पुरानी बातें;
तुमने उस दिन जो कुछ कहा था
फ़ोन की खरखराहट ने सुनने न दिया था,
तुम्हारी अधदबी आवाज़ के नशे ने
मुझे शांत कर दिया था
मान लेता हूँ मन में आज भी
तुमने कुछ अच्छा ही कहा होगा।

काश! ये दुनिया पहले देख पाता;
समझ जाता मैं वह अटल विषम सत्य
जो व्याप्त है सदियों से दुनिया में,
मानसिक विलास है जिसका सुविधा शुल्क
प्रेम, एक वैसी ही सुविधा है!
सब बेकार हो गया उस दिन मेरा लिखा
जब तुमने मुझे “एबनार्मल” कह दिया।

– प्रशान्त

– अशान्त

– Ashant

अशान्त की चिट्ठी

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