गर्म चट्टान

– अशान्त ·

– Ashant ·

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यूँ  तप रहा है मेरा बिस्तर 

जैसे रेगिस्तान में तपती हुयी 
एक गर्म चट्टान,
इस निर्जन जीवन में 
नहीं कोई और सम्बल।   
मेरे पीठ के फफोले 
अब फूटते भी नहीं
ना ही छोड़ते हैं कोई निशान,
सब अंकित है बस मन में 
अतीत ही मेरा अनचाहा साथी है। 
जीवन त्रास देता है 
जब हर सुबह दिलाती है याद 
दुःस्वप्न जो बीती रात देखा था,
मेरे रिसते हुए पसीने से कोई मिट्टी 
उपजाऊ नहीं होगी। 
काश! मैं अनवरत छू पाता 
बिना हिले बिना डरे
उस गर्म चट्टान को,
गल जाती मेरी आत्मा, मेरा अस्तित्व 
कदाचित, मैं जी पाता अंतिम सत्य। 
– प्रशान्त 
   

– अशान्त

– Ashant

अशान्त की चिट्ठी

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