मेरी मेज पर रखे शीशे के गमले में
जो कि आधा भरा है पानी से
खड़ा है एक छोटा सा पौधा
घिरा कुछ रंगीन गोलियों से
मेरी बेरंग सी ज़िन्दगी में
बस ये ही रंग बाकी हैं;
बाकी हैं रंग जो भी
वो वैसे ही हैं
जो मैंने गोंचे थे बचपन में
आर्ट के एग्ज़ाम में
मुझे तब ही की तरह
आज भी मार्क्स कम ही मिले!
इस तपते कमरे में
दिन में भी जलती है सी एफ एल
जिसके नीचे चमचमा रहा है
शीशे का गमला
जी हाँ, निकली हैं
कुछ नयी पत्तियाँ उसमें
नव जीवन पनपा है
चीर कर सब दुश्वारियाँ,
मुझसे सवाल करती हैं मेरी आँखें
कब बुझे हुये चेहरे को
कोई सच्ची हँसी चीर पायेगी?
वो किसलय
प्रतीक है नवीनता का
देख कर सोचता हूँ उसको
क्या मैं भी प्रतीक हूँ
किसी भी सिद्धांत,विचारधारा का?
या मैं हूँ एक आदम-घोंघा
जो घिसट रहा है किसी अदालत में
पुराने मुक़दमे की तरह!
आज बात करता हूँ
नयी पत्तियों से
क्या पता
मिल जाये मुझे भी
मेरा खोया हुआ रास्ता।
– प्रशान्त

Leave a Reply