मेरी भी नज़र में

– अशान्त ·

– Ashant ·

· in

मोबाईल की स्क्रीन पर देखते देखते
कुछ यूँ हँसी तुम्हारी आँखें
एक मुस्कुराहट दौड़ सी गयी
मेरी भी नज़र में

वो सपनों के नगर में
एक छोटे से कोने में
यूँ बेफ़िक्र लेटे थे तुम
दुनिया ही मिल गयी हो
तुम्हें मेरी नज़र में

क्यों फ़िदा हर अदा
इश्क़ क्यों इतना अलहदा
कोहरे सी उड़ती
तुम्हारी शख़्सियत जैसे
जम गयी हो मेरे बदन पे

छुपा लो ख़ुद में मुझे
तुम कुछ इस तरह
छुपाता हो ठन्डे पैर
रजाई गरम में
बढ़ जाता है प्यार
कभी कभी यूँ भी
हिलते भी नहीं होठ
तुम्हारे नरम से

कहते हैं पहली नज़र में
हो जाता है प्यार
झुकी हुयी हैं आँखें
तुम्हारी इबादत में
क्या होगा इश्क़ कभी
तुम्हें भी अपने सनम से?

-प्रशान्त

– अशान्त

– Ashant

अशान्त की चिट्ठी

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