पड़ते नहीं अब कहीं मेरे पैरों के निशान
मेरी रूह मुझसे कब की जुदा हो चुकी है
जो जलती थी मुझ में मैं चलता था जिस से
वो हसरत भी मुझसे विदा हो चुकी है
न दिखता है कोई अब मुझे ज़िन्दगी सा
आँख कब की मेरी पत्थर हो चुकी है
न आँखों में आँसू न गले में हरारत
मेरे हिस्से के ग़म बरसात रो चुकी है
पलट पिछले पन्ने कोई अनपढ़ मुझे कर दे
ज़िन्दगी मेरी अब हद से आगे पढ़ चुकी है
–प्रशान्त

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