सिजदे में झुके सर रोज़े की नमाजों में
मालिक देता है रहमत इंसानियत के जहाजो में
मेरे जज़्बे पर मेरे मालिक की नज़र है
मेरे झुके सिर को वो एहतेराम देता है
मैं अधूरा हूँ उसके मुकम्मल जहान में
फिर भी शुक्रिया उसे सुबह-शाम देता हूँ
तड़प के मर जाता है कोई जब बंद दरवाज़े पर
इंसानियत तो मरती है,ख़ुदा भी रो देता है
ज़ालिम की ज़ुल्मत का करोगे सामना कैसे
रंग इल्म-ओ-हिम्मत का भर लो हयात में
मोहब्बत चाहे जैसी हो कुछ बोल दो उसको
पाकीज़गी ख़ुदा की तुम तक ज़रूर आएगी
लिपट जाओ ज़िन्दगी से जैसे माँ का आँचल
सच्ची कोशिशों का ईनाम ख़ुदा ज़रूर देता है
-प्रशान्त

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