अब भी तेरे इंतज़ार में बैठे हैं

– अशान्त ·

– Ashant ·

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जो धड़क उठे वो दिल ही क्या
हम तेरी आरज़ू में बेहाल बैठे हैं
सुन्न सब अब कुछ लगता नहीं
अब भी तेरे इंतज़ार में बैठे हैं

परस्तिश तुम्हारी नूरी निगाहों की
मोहब्बत थी मुरव्वत नहीं
चुप रहना नहीं बेशिकवा होना
सारे मुंसिफ़ क्यों चुप बैठे हैं

आशिकी का करम है ये
जीना भी एक अदा बन जाती है
जी लिया हमने भी जैसे तैसे
ऐ क़ज़ा तेरे दीदार को हम बैठे हैं

पसोपेश में हैं मेरे अब शब-ओ-सहर
वस्ल है या फिर है हिज्र का असर
सवाल करते हैं ख़ुद से मगर
जवाब बेख़बर जाने कहाँ बैठे हैं

नहीं रूकती है ज़िन्दगी
सच है कोई बड़ी बात नहीं
ये वो राज़ नहीं खुलने के जिसके
हम सरोकार में यूं बैठे हैं

मिल भी गया होता तो क्या होता
कीमत उसकी भी मामूली हो जाती!
चमकता हैं अनछुआ नक्काश कंगूरा
कारीगर उसके यार यहाँ बैठे हैं

वो जो क़ातिल हैं जान महफ़िल की
महकूम ज़माना उनका लगता हैं
देखता नहीं उन हबीबों को कोई
चमकते लिबासों में जो बैठे हैं

आख़िर क्या मज़ा
मोहब्बत में मज़िल मिल जाने का
ना कसक है न अब कोई ख़लिश है
हम बहते दरिया ही ठीक हैं तनहा
समंदर की दुनिया बड़ी अजीब है

-प्रशान्त

 

– अशान्त

– Ashant

अशान्त की चिट्ठी

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Comments

One response to “अब भी तेरे इंतज़ार में बैठे हैं”

  1. Unknown avatar

    हृदय से निर्मित भाव हैं ,सहृदयता और भावुकता में लिखा हुआ उत्कृष्ट रचना,sir

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