सतत प्रयासों के फलित ना होने की कुंठा ही इस कविता के सृजन का कारण हैं। एक छटपटाहट है अपने तत्व को फिर से पाने की जो शायद जीवन की भूल भुलैया के किसी संकरे कोने में खो गया है। प्रशंसा, आलोचना एवं टिप्पणियाँ सादर आमंत्रित हैं।
प्रतिमा खंडित है
उस मंदिर की
जिसे मैंने बनाया था,
जा कर पता लगाया, जब पास
तो पता चला
प्राण है उसमें
पर
आत्मा लापता है।
धृष्टता का फल है
मैं कुंठित हूँ आज
बेमौसम बोये बीज का
फल मीठा नहीं होता,
ख़ाका नयी ज़मीन का
खींच रखा है कब का
अब प्रतीक्षा है उस क्षण की
जब खोयी हुयी,
वो
पहली ईंट मिल जाये।
-प्रशान्त

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