ढूंढते थे पता मेरा कल जो कभी,
लोग वो ही मुझे लापता कर गये ।
लोग वो ही मुझे लापता कर गये ।
दे दी सज़ा हमने सह भी लिया,
ना जाने क्या हम ख़ता कर गये।
जिनकी महफ़िल की मैं कभी शान था,
वो ही आशिक़ हमें बेवफा कर गये।
रंग हथेली पर प्यार का जो चढ़ना ही था,
मेंहदी मेरी मोहब्बत की क्यों फना कर गये।
इससे पहले की वो होते किसी और के,
हाल मेरा वो यारों से पता कर गये।
आँखें जलती हैं पर आँसू आते नहीं,
कैसी क़ातिल निशानी वो अता कर गये।
-प्रशान्त

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