सब कुछ रोज़ के जैसा था
देर से उठ कर देखा तो
सूरज कुछ धीमा-धीमा था!
कल, फिर क्यों तुम्हारी याद आयी?
देर से उठ कर देखा तो
सूरज कुछ धीमा-धीमा था!
कल, फिर क्यों तुम्हारी याद आयी?
पढ़ रहा आज-कल मैं जिसे
प्रथम-पृष्ठ उस पुस्तक का देखा तो
पाया, तुम्हारी लिखाई में लिखा मेरा नाम!
कल, फिर क्यों तुम्हारी याद आयी?
अधपकी सी नवम्बर की सर्दी
उस पर अधखुला मेरा कम्बल
पल भर में जैसे तुमने मुझको समेट लिया!
कल, फिर क्यों तुम्हारी याद आयी?
खोला कुछ काम से जब कल संदूक
मिले पुराने कपड़े, तुमने छुये थे जो कभी
उनसे आती तुम्हारी महक मुझे झकझोड़ गयी!
कल, फिर क्यों तुम्हारी याद आयी?
यूं तो तस्वीर तुम्हारी है बसी दिल में
पर उसको इस डर से ना देख सका
क्या मेरा अब भी कोई हक़ या साया है!
कल, फिर क्यों तुम्हारी याद आयी?
-प्रशान्त

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