वो भी हैं अंग तुम्हारे

– अशान्त ·

– Ashant ·

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ओ प्रियतमा!

मत नोचवाओ तुम अपने बाल,
वो भी हैं अंग तुम्हारे
प्रतीक तुम्हारे स्वातंत्र्य का। 
मैं प्रियतम भी फिर 
कैसा सच्चा प्रेमी हूँ?
अगर आधार मेरे प्रेम का 
नहीं है तुम्हारे भाव 
पर वो चिकनी चमड़ी है,
पाने जिसको 
तुम्हें जाना पड़ता है
छोड़ अपना प्रेमालय 
उस बाज़ार,
जहाँ प्रेम मात्र 
कार्ड में पढ़ने-बिकने वाली 
वस्तु है!
-प्रशान्त  

– अशान्त

– Ashant

अशान्त की चिट्ठी

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