पता नहीं जब झगड़ा क्या था

– अशान्त ·

– Ashant ·

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कोई जन्नत का तालिब है, कोई ग़म से परेशान है
गर्ज़ सजदा करवाती है ,यूं ही इबादत कौन करता है

यूं ही सच्चा था सब अगर, फिर सपना क्यों था
अगर इश्क भी था तेरा-मेरा, तो अपना क्या था

जो उड़ना ही था हमको, हालात की बेदर्द आँधी  में
चलते रहना था ही बेहतर, उस मोड़ पर आखिर रुकना क्या था

ख़ता कहूं मैं किसकी, जब उस पर ना इख्तियार किसी का
क्या सज़ा भी आखिर होगी मुक़र्रर, पता नहीं जब झगड़ा क्या था

-अशांत

– अशान्त

– Ashant

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