गिराया वक़्त ने बहुत लेकिन
बेशर्म निकला मैं भी बहुत
इतना कि
अब कोई चोट दर्द नहीं देती
अब कोई गाली खीझ नहीं देती
अब कोई हार ग़म नहीं देती
अब कोई बात कोई रंग नहीं देती
फिर भी बस इसी सोच में
जीता रहता हूँ मैं
तलाश में उस चाँद की
है इसी दुनिया में जो
जहाँ जा सकता है सिर्फ
मन का जहाज।
बेशर्म निकला मैं भी बहुत
इतना कि
अब कोई चोट दर्द नहीं देती
अब कोई गाली खीझ नहीं देती
अब कोई हार ग़म नहीं देती
अब कोई बात कोई रंग नहीं देती
फिर भी बस इसी सोच में
जीता रहता हूँ मैं
तलाश में उस चाँद की
है इसी दुनिया में जो
जहाँ जा सकता है सिर्फ
मन का जहाज।
-अशांत

Leave a Reply