कौन हो तुम?कहाँ हो तुम?

– अशान्त ·

– Ashant ·

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कल रात ही तो सपने में
कॉफ़ी पी थी तुमने मेरे साथ
पर मेरी इस ज़िन्दगी में,इस सुबह में
कौन हो तुम?कहाँ हो तुम?

मेरे उस पुराने से कप पर
रखे थे तुमने अपने गोरे हाँथ
तुम्हारी प्यारी पतली उंगलियाँ
जिनके निशाँ अभी तक है उस पर
काँप रहीं थी रात की उस ठण्ड में
सेंक रही थी जिन्हें तुम अपनी गर्म सांस पर
तुम्हारे वो उलझे काले लम्बे बाल
बिखरे थे कल रात भी
चेहरे पर,हमेशा की तरह
और उस अँधेरे में कुछ भी
दिखाई नहीं दिया
फिर नहीं बोला था कुछ तुमने
बस हंस के टाला था मुझको
फिर खुद ही क्यों संभाला था मुझको
मैं बुलाऊं ना बुलाऊं
मेरे सपनों में तुम हक़ से आती हो
उतनी ही आसानी से
आँख खुलते ही गायब हो जाती हो
आखिर मेरी इस ज़िन्दगी में
कौन हो तुम?कहाँ हो तुम?

कल भी कितनी चालाकी से
अपना चेहरा छुपा लिया था तुमने
बस हँसते हँसते
अपना नाम भी छुपा लिया था तुमने
कोई पहचान ना छोड़ी थी अपनी
हमेशा की तरह
मेरे बारे में लेकिन सब कुछ
जान लिया था तुमने
कितनी सुन्दर सी बैठी थी तुम
मेरे कमरे में
जो सपने में
ना जाने कितना बड़ा हो गया था
कॉफ़ी फेंटते हाथ पर
जो बना था चम्मच का निशान
कैसे अपने होठों से मिटाया था तुमने
बिना कुछ कहे
कितना कुछ बता दिया था तुमने
मेरे हर एक लफ्ज़ को सुना था बेझिझक
दुहराई हुई बातों पर भी
आँसूं बहाया था तुमने
इतना समझती हो तुम मुझको
तो अपना नाम,चेहरा
क्यों छुपाया था तुमने??
क्यों समझती नहीं मेरी परेशानी
आँख खुलते ही जो मुझसे आ मिलती है
आखिर मेरी इस ज़िन्दगी में
कौन हो तुम?कहाँ हो तुम?

क्यों नहीं समझती
इस ज़िन्दगी में
तुम्हारी तलाश में
उन गलियों में भी भटक जाता हूँ
होश में जिनमे
ना रखूँ मैं एक कदम भी
क्यों नहीं समझती
तुम्हारी सपनो की
छुअन जीने में
मैं जालिमों के सामने
बेपर्दा हो जाता हूँ
जो मुझे,मेरी मोहब्बत को
नोच-चूस कर
दौलत ताकत के गुमान में
फेंक देते हैं
नहीं समझते नादान
कि मैं तुमको ढूंढ रहा था
ना कि प्यार कर रहा था उनको
और कितना मुझे भटकाओगी
कब तक बस सपनो मे,बहलाओगी
आखिर मेरी इस ज़िन्दगी में
कौन हो तुम?कहाँ हो तुम?

कब आओगी तुम सपनो से बाहर
मिटाओगी कब ज़ख्मों के निशान
जो उन जालिमों ने
तुम्हारी आड़ में बनाये हैं
कब लड़ोगी मेरे लिये
उन दगाबाजों से
तुम्हारी परछाईं में
जिन्होंने मुझ पर सितम ढाये हैं
कब मिलोगी मुझसे
और करोगी बेपनाह मोहब्बत
जिसके इरादे तुमने मुझे
सपनों में दिखाए हैं
क्या दर्द नहीं होता तुमको
जब तुम्हारे कारण
कोई भद्दा ज़ालिम
मुझे खिलौना सा बना देता है
अगर मेरी ज़िन्दगी में ना ही सही
तो सपने में
अपना चेहरा तो दिखा जाओ
अपना नाम तो बता जाओ
जिस से ना ढूँढूं तुम्हे
इस जहाँ में मैं
और ना पूछूँ खुद या किसी से
आखिर मेरी इस ज़िन्दगी में
कौन हो तुम?कहाँ हो तुम?

-अशांत 

– अशान्त

– Ashant

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