रुसवा

– अशान्त ·

– Ashant ·

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रुसवा हो जो फाड़ी थी मेरी चिट्ठियाँ,उम्मीद है उंगलियाँ तुम्हारी न दुखी होंगी
दिल का मेरे हाल जो भी रहा हो,उम्मीद है तुम्हारी आँखें न भीगी होंगी

वो जो खून टपका था उन टुकड़ों पर,सब्र रखो तुम्हारा ना था
और एक हमारा दिल है, जिसमे आंसुओं की कोई कमी ना थी

फासलों का ज़िक्र करना नहीं मुनासिब,तुमसे दूर मैं कभी था ही नहीं
गिला कर मसरूफियत का दिल तोड़ देना,चलन हुस्नवालो का नया है तो नहीं

बात इतनी है मैं तेरे वादे से बंधा हूँ,रसूख रकीब का वर्ना कुछ भी नहीं
काहिल भले हूँ मैं दुनिया की नज़र में,इश्क में मेरे कोई कमी तो नहीं

अब जब मुझसे नहीं कोई नाता तेरा,पहरे ख़्वाबों के मेरे क्यों तोड़ते हो
जब सब था तुम्हारा तब तुम थे नहीं,अब सोये जज़्बातों को क्यूँ छेड़ते हो

कैसे खुदा बन बैठे हो तुम,बन्दों की कद्र तुमको कुछ भी नहीं
कभी फुर्सत में जब बैठोगे तुम,आँख खुद से मिला सकोगे नहीं

अशांत

– अशान्त

– Ashant

अशान्त की चिट्ठी

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