फ़िक्र इतनी है क्यों आज अंजाम की
वक़्त आग़ाज़ के कुछ तो सोचा ना था
था वफ़ा का जो रंग सुर्ख लाल सा
पल में सूखा,भला ऐसा क्या हो गया
वक़्त आग़ाज़ के कुछ तो सोचा ना था
था वफ़ा का जो रंग सुर्ख लाल सा
पल में सूखा,भला ऐसा क्या हो गया
वो जगह,वो समाँ और मैं भी वही
है ज़माना भी सब,पर मेरा आशिक नहीं
कुफ्र मुझसे ना जाने है क्या हो गया
मेरा मालिक जो मुझसे जुदा हो गया
मुफलिसी में जो संग मेरे हरदम रहा
शोहरत में अब ना मेरा हमदम रहा
जो मिला था मुझे उम्र भर के लिए
वो यार मेरा मुझमें कहाँ खो गया
किस तराज़ू में नापूं मैं ये ज़िन्दगी
मुझको मेरा मोल कुछ तो मिले
भीड़ बाज़ार में यूं खूब होती थी “अशांत”
कोई आया ना आज,जाने क्या हो गया
अशांत

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