सोते हुए बीच रात आज आँख खुल गई
माथे पर था पसीना
सांसें भी कुछ तेज़ थीं
भागती धड़कन से एहसास हुआ
मैं जिंदा हूँ
एक सपने में अभी-अभी
देखी बीते सालों की पहाड़ ज़िन्दगी
जिस पर चलते,चढ़ते
थक गया था मैं
रुक गया था मैं
पैर फिसला, हवा में कुछ गोते खाए
नीचे गिरकर हुआ यकीन
मैं जिंदा हूँ
आँखों के आईने में शख्स वो कौन था
जिस तक पहुँचते ही
वो पानी सा छिटक जाता था
कितना भागा मैं उसके पीछे
ये जानते हुए कि भीड़ के दरिया में
उसको खोना ही है और
मुझको रोना ही है
वक़्त के सागर में जब
पैरों तले ज़मीन खिसकी
नीचे गिरकर हुआ यकीन
मैं जिंदा हूँ
ऊब गया खुद से ही मैं
आखिर कब तक उदास रहूँ
दूसरो कि ख़ुशी के खातिर
क्यों खुद से दूर,औरों के पास रहूँ
ठंडी होनी ही है एक दिन ज़िन्दगी
क्यों ना मैं गर्म आज़ाद रहूँ
आज खुद ही गिर जाता हूँ
हमेशा उठ कर जीने को
तब ये जहां कहेगा मुझसे
हाँ, तुम जिन्दा हो!
अशांत

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