उसमे ईमान अब तलक बाकी है
क्या बयान करूँ हाल अपने शहर का
हमारी आस्तीनों में पलते यहाँ सांप बहुत हैं
पर ये न समझना कि तुम्हारे यहाँ सब ठीक है
ईमान डिगते अब देर नहीं लगती
चाहे किसी का भी हो वो
तलवारें तो बस खून की प्यासी हैं
आज रंगों का मतलब सिर्फ ख़ुशी नहीं
अब तो झंडों के रंग का जलवा है
रंग से इंसान भी पहचाने जाते हैं
सफेद केसरिया नीला लाल बदलते देर नहीं लगती
इंसान बन पैदा हुए जहान में
मुल्क तक तो गनीमत थी
जाति मजहब की भी आदत सी हो गई थी
पर रिश्तों का बटवारा सहा नहीं जाता
किसपे यकीन करे कौन कब दे दे दगा
ये यकीन की मुफलिसी का दौर है
पागल सा ही तू अच्छा था ‘अशांत’
अब तो तेरी रूह भी खुदा से मुखबिरी करती है
बहुत रंजिश है तेरे शहर में ऐ दोस्त मगर है सुकून

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