पच्चीस साल पहले यहाँ एक दुर्घटना हुई थी
कहते हैं कारखाने से निकली गैस ने
हज़ारों का दम घोंटा था,
हज़ारों आज भी मर रहे हैं घुट घुट कर
याद में उनकी, जो बदनसीबी से
उस वक़्त भोपाल में थे;
पर ये महज़ दुर्घटना नहीं थी
एक सोचा समझा षड़यंत्र था,
पूँजीवाद के राक्षस ने
लोकतंत्र के दलालों से हाथ मिलाकर
बेगुनाह, जिन्हें रोटी की आशा थी
मौत की गोली खिलाई थी
कोई भी निर्णय त्रासदी की क्षतिपूर्ति नहीं कर सकता
पर, यहाँ तो औपचारिकता भी निभाने में
पच्चीस साल लग गए!!
महज़ दुर्घटना नहीं है ये
एक प्रश्नचिंह है हमारी व्यवस्था पर
जिसका उत्तर अर्धविराम पर ही ख़त्म हो जाता है
निकल कर उद्देशिका से लोकतंत्र के मूल्यों को
आम आदमी के जीवन का भाग बनना होगा
पर ये करेगा कौन??
वो, जिनके लिए अर्थ हेतु
हर अनर्थ जायज़ है?
विचारधारा, आज सजाती है अखबारों के सम्पादकीय
मानव दर्शन को शायद मुंह चिढाती है!!
मानव स्मृति भुला देगी उस त्रासदी को शायद
पर मूल्य-हरण की इस त्रासदी के लिए कोई
कौन मुआवजा देगा???
-प्रशान्त

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