मैं सन्नाटा चीरना चाहता हूँ
चिल्लाता हूँ पूरे जोर से
पर आवाज़ ना जाने कहाँ खो जाती है
रह जाता है पसरा हुआ बस
चारों ओर सन्नाटा
पर यहाँ सब लोग तो हैं
हर दिशा में फैला हुआ शोर
बताता है कि लोग जिंदा हैं
पर मुझे होता आभासित
कर्कश ध्वनि समूहों में लिपटा हुआ
ह्रदय बैठा देने वाला सन्नाटा
मैं सन्नाटा चीरना चाहता हूँ
पर उस तरह नहीं जैसे
दुशासन ने द्रौपदी का मान चीरा था
मुझे तो सिर्फ पानी में पत्थर फेंकना है
क्योंकि ठहरा हुआ नीर सड़ जाता है
विद्रोह करना है अगर बेतुकी बात
तो मुझसा कोई बेतुका आदमी नहीं
प्रहार व्यक्ति नहीं व्यवस्था पर
आघात ऐसा तत्पश्चात प्रतिघात की क्षमता न रहे
गलियों गावों कस्बों शहरों कुनबों
लोकतंत्र के लाल फीतों में
आभासित होता है सर्वव्यापी
ह्रदय बैठा देने वाला निरंकुश सन्नाटा
अशांत
Note: The picture is designed by Rumman Rizvi, student of NIFT Kangra.
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